मंगलवार, 14 जुलाई 2009

शिव पूजन की प्रथम स्थली चित्रकूट : रामभद्राचार्य

Jul 13, 10:24 pm
चित्रकूट। शिवलिंग की परंपरा का प्रथम पूजन स्थल चित्रकूट है। मंदाकिनी के किनारे भगवान मत्स्यगयेन्द्र नाथ हैं। भोलेनाथ ने यहीं पर अंधकासुर का वध कर उसकी खाल की छाला पहनी थी। यह बाते सोमवार को संकल्प पूर्ति महोत्सव के पंडाल पर पहुंचे जगद्गुरु स्वामी राम भद्राचार्य जी महाराज ने कहीं।
संकल्प पूर्ति महा महोत्सव के छठे दिन रैनबसेरा मैदान में पहुंचे जगद्गुरु ने चित्रकूट की महिमा का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि भले ही देश में हर जगह पीठों की स्थापना प्राचीन हो पर पीठों की स्थापना की परंपरा तो चित्रकूट से ही प्रारंभ हुई हैं। यहां पर भगवान राम ने भरत को अपनी खड़ाऊं देकर इस परंपरा की शुरुआत की थी। जगद्गुरु ने कहा कि आज के दौर में हर व्यक्ति तनाव व भाग दौड़ भरी जिंदगी का आदी होने के चलते थका हुआ है। ऐसे में थका का उल्टा कथा होता है, वह कथा के माध्यम से तरोताजा होकर फिर से अपने काम में लग सकता है। उन्होंने कहा कि भारत की समस्याओं का निदान सिर्फ राम चरित मानस में है। जब तक रामचरित मानस इस देश का राष्ट्रीय ग्रंथ नहीं होगा तब तक देश का कल्याण व समस्याओं से निदान नही हो सकता। श्री राम के साहित्य को उन्होंने आज के परिवेश में परिभाषित करते हुये कहा कि रावण से बड़ा आतंकवादी कोई हुआ ही नही है। उन्होंने मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम द्वारा महादेव के पार्थिव पूजन को रामचरित मानस के अयोध्या कांड की चौपाई 'तब मज्जन कर रघुकुल नाथा, पूर्जि पार्थिव नायंऊ माथा' का उदाहरण देकर सेतु बंधु रामेश्वर में भी राम द्वारा बालू के शिव लिंग बनाकर उनका पूजन करने का उदाहरण दिया। इस दौरान आचार्य पं. देव प्रभाकर शास्त्री दद्दा जी ने जगद्गुरु का स्वागत मंच पर किया। उसके पहले फिल्म स्टार आशुतोष राणा व राज पाल यादव, पद्म सिंह, संगीतकार सुजीत चौबे, केवल कृष्ण आदि ने जगद्गुरु की अगवानी की। इस दौरान जगद्गुरु की निजी सचिव डा. गीता मिश्रा 'बुआ जी', कर्नाटक वाली माता जी मौजूद रहीं।

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